:डॉ रणजीत कुमार सिन्हा:
हिन्दी आलोचना का सार्थक स्वरूप का उद्घाटन करने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी का सार्थक प्रथम इतिहासकार भी थे।हिन्दी आलोचना में विगत तीन-चार दसक से कुछ खास न तो घटित हुआ जिसे प्रस्तुत करके महारत हासिल किया जा सकता है।हाँ हजारों की संख्या में आलोचनात्म शीर्षक से आलोचना की पुस्तके बाजार में आई,तथा उन कृतियों का प्रायोजित, विवरणधर्मी ,प्रशंसात्मक समीक्षाओं का अम्बार देखने को मिला।इस तरह का स्तुती लिखने वाले कोई नवलेखिया आलोचक नहीं,बल्कि तथाकथित नामवर,प्राध्यापक वर्ग ही रहा,जिसका दबदबा आज भी शिक्षण मठो पर हर तरह से हैं।इन महालोचकों ने आलोचना विधा को पंगु-लंगू बना डाला।
आजकल वस्तुनिष्ठ आलोचना का आग्रह तो है,पर उस आलोचना को सहने की ताकत आलोचक या लेखक के पास नहीं हैं।अगर आलोचना लेखक के मनोकुल नहीं है तो वह आपको ,अपना दुश्मन मान लेगा।या यहा कहता फिरेगा कि अमुक आलोचक को साहित्य की समझ ही नहीं हैं।बहुत बार तो बेहुदगी से भी नीचे उतर आता है।उसको बचाने के लिए,उसके पक्ष में बहुत से महान तकमा वाले खड़े नज़र आते हैं।आप सार्थक ,वस्तुनिष्ठ आलोचना करके अकेले,तिरस्कृत समझे जायेगें।
आलोचना कर्म अब लोचा भरा नज़र आता है।यह लोचा भरा उनके लिए है जो वस्तुनिष्ठ आलोचना करते हैं।बाकी लोगों (आलोचकों)के लिए यह फलने-फूलने,लोकार्पण,विमोचन,लिखने-छपने,पुरस्कार आदि का फलता-फूलता व्यापार है।
हिन्दी साहित्य इसका प्रमाण है,जिसने भी किसी कृति का सार्थक या वस्तुनिष्ठ आलोचना किया ,उसका स्वागत हुआ,हाँ भले ही उसे उस समय नौकरी में पदोन्त्ती हेतु समस्याएँ उठानी पड़ी हो।
हिन्दी आलोचना का जन्म रीतिकाल से कुछ लोग मानते हैं,तो कुछ भक्तिकाल से भी।हिंदी आलोचना भारतेंदु युग,द्विवेदी युग,शुक्ल युग,शुक्लोत्तर युगीन आलोचना,प्रगतिशील आलोचना या समीक्षा से आजादी तक।फिर नई समीक्षा,साठोत्तरी आलोचना या समीक्षा,अपातकालीन समीक्षा या आलोचना।सातवें दसक और उसके बाद ,उत्तरआधुनिकता,विमर्शवाद का दौर,भूमंडलीकरण,दलित,स्त्री,आदिवासी,किसान,पर्यावरण,आदि ।
【-लेकिन आचार्य शुक्ल,हजारी प्रसाद द्विवेदी, से लेकर रामविलास शर्मा,नामवर सिंह,शिवदान सिंह चौहान,प्रकाशचन्द्र,नेमिचन्द्र जैन, गुप्त,मुक्तिबोध,अज्ञेय,विजयदेवनारायण साही,निर्मल वर्मा,लक्ष्मीकान्त वर्मा,रामस्वरुप चतुर्वेदी,शमशेर बहादुर सिंह,गिरिजाकुमार माथुर,धर्मवीर भारती,मलयज,विनोद शाही,शंभुनाथ(त्रयी),परमानंद श्रीवास्तव,कुँवर नारारण,रघुवीर सहाय,देवीशंकर अवस्थी,विजयमोहन सिंह,रमेशचन्द्र शाह,नंदकिशोर नवल,विष्णु खरे,अशोक वाजपेयी,मैनेजर पाण्डेय,निर्मला जैन,डॉ रविभूषण,डॉ.शशिभूषण,विजेन्द्र नारायण सिंह,,सुधीश पचौरी,उदय प्रकाश,डॉ.पी.एन.सिंह,डॉ.ऋषिकेश राय,श्रीभगवान सिंह,डॉ.भरत प्रसाद,डॉ.अजित प्रियदर्शी,डॉ.आशिष त्रिपाठी,डॉ.राहुल सिंह,-आदिक】
वर्तमान समय में वस्तुनिष्ठ आलोचना करना दुश्मनी मोलना है।
हिन्दी आलोचना का सार्थक स्वरूप का उद्घाटन करने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी का सार्थक प्रथम इतिहासकार भी थे।हिन्दी आलोचना में विगत तीन-चार दसक से कुछ खास न तो घटित हुआ जिसे प्रस्तुत करके महारत हासिल किया जा सकता है।हाँ हजारों की संख्या में आलोचनात्म शीर्षक से आलोचना की पुस्तके बाजार में आई,तथा उन कृतियों का प्रायोजित, विवरणधर्मी ,प्रशंसात्मक समीक्षाओं का अम्बार देखने को मिला।इस तरह का स्तुती लिखने वाले कोई नवलेखिया आलोचक नहीं,बल्कि तथाकथित नामवर,प्राध्यापक वर्ग ही रहा,जिसका दबदबा आज भी शिक्षण मठो पर हर तरह से हैं।इन महालोचकों ने आलोचना विधा को पंगु-लंगू बना डाला।
आजकल वस्तुनिष्ठ आलोचना का आग्रह तो है,पर उस आलोचना को सहने की ताकत आलोचक या लेखक के पास नहीं हैं।अगर आलोचना लेखक के मनोकुल नहीं है तो वह आपको ,अपना दुश्मन मान लेगा।या यहा कहता फिरेगा कि अमुक आलोचक को साहित्य की समझ ही नहीं हैं।बहुत बार तो बेहुदगी से भी नीचे उतर आता है।उसको बचाने के लिए,उसके पक्ष में बहुत से महान तकमा वाले खड़े नज़र आते हैं।आप सार्थक ,वस्तुनिष्ठ आलोचना करके अकेले,तिरस्कृत समझे जायेगें।
आलोचना कर्म अब लोचा भरा नज़र आता है।यह लोचा भरा उनके लिए है जो वस्तुनिष्ठ आलोचना करते हैं।बाकी लोगों (आलोचकों)के लिए यह फलने-फूलने,लोकार्पण,विमोचन,लिखने-छपने,पुरस्कार आदि का फलता-फूलता व्यापार है।
हिन्दी साहित्य इसका प्रमाण है,जिसने भी किसी कृति का सार्थक या वस्तुनिष्ठ आलोचना किया ,उसका स्वागत हुआ,हाँ भले ही उसे उस समय नौकरी में पदोन्त्ती हेतु समस्याएँ उठानी पड़ी हो।
हिन्दी आलोचना का जन्म रीतिकाल से कुछ लोग मानते हैं,तो कुछ भक्तिकाल से भी।हिंदी आलोचना भारतेंदु युग,द्विवेदी युग,शुक्ल युग,शुक्लोत्तर युगीन आलोचना,प्रगतिशील आलोचना या समीक्षा से आजादी तक।फिर नई समीक्षा,साठोत्तरी आलोचना या समीक्षा,अपातकालीन समीक्षा या आलोचना।सातवें दसक और उसके बाद ,उत्तरआधुनिकता,विमर्शवाद का दौर,भूमंडलीकरण,दलित,स्त्री,आदिवासी,किसान,पर्यावरण,आदि ।
【-लेकिन आचार्य शुक्ल,हजारी प्रसाद द्विवेदी, से लेकर रामविलास शर्मा,नामवर सिंह,शिवदान सिंह चौहान,प्रकाशचन्द्र,नेमिचन्द्र जैन, गुप्त,मुक्तिबोध,अज्ञेय,विजयदेवनारायण साही,निर्मल वर्मा,लक्ष्मीकान्त वर्मा,रामस्वरुप चतुर्वेदी,शमशेर बहादुर सिंह,गिरिजाकुमार माथुर,धर्मवीर भारती,मलयज,विनोद शाही,शंभुनाथ(त्रयी),परमानंद श्रीवास्तव,कुँवर नारारण,रघुवीर सहाय,देवीशंकर अवस्थी,विजयमोहन सिंह,रमेशचन्द्र शाह,नंदकिशोर नवल,विष्णु खरे,अशोक वाजपेयी,मैनेजर पाण्डेय,निर्मला जैन,डॉ रविभूषण,डॉ.शशिभूषण,विजेन्द्र नारायण सिंह,,सुधीश पचौरी,उदय प्रकाश,डॉ.पी.एन.सिंह,डॉ.ऋषिकेश राय,श्रीभगवान सिंह,डॉ.भरत प्रसाद,डॉ.अजित प्रियदर्शी,डॉ.आशिष त्रिपाठी,डॉ.राहुल सिंह,-आदिक】
वर्तमान समय में वस्तुनिष्ठ आलोचना करना दुश्मनी मोलना है।
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