पतहर

पतहर

कहानी कलह का घर

कहानी 
कलह का घर
                              राजेश झरपुरे

उन दिनों जब वे हमारे पड़ोस में रहने आये. मैं बड़ा और समझदार होने लगा था। इस तरह मैं यह कह सकता हूँ कि वे मेरे लिए समझदारी और बड़े होते जाने का एहसास लेकर आये थे। मेरे बचपन ने ऐसा क्यों जैसा क्यों नहीं जैसी  बातों से उलझना आरम्भ कर दिया था।

उनके यहाँ हर साल.ढेड़ साल में एक नया शिशु आ जाता। पड़ोस में आने के कुछ माह पहले ही उनका विवाह हुआ था। अन्तिम शिशु के आने तक संख्या पूरी नौ हो गई। नौ में से किसी एक को भी मैंने उनकी माँ की गोद में खेलते या लोरी सुनते नहीं देखा। पिता को उन्हें पैदा करने के बाद इतनी फ़़ु़रसत नहीं मिली कि वह उन्हें गोद में उठाकर कहीं बाज़ार.हाट घुमा लाते।

इस तरह पड़ोस में वे पूरे नौ भाई.बहन हुए। नौ ज़िन्दा। ऊपर से एक.दो को छोड़ बाकी सभी और छोटों की मरने की कामना के बाद भी ज़िन्दा। हालाँकि इस सत्य का पता उन्हें बाद मेंए बड़े होने पर चल पाया। उनकी छोटी.छोटी शरारतों पर उनकी माँ कहती न ! होते से मर जाते तो अच्छा होता।यह  बात वे आये दिन सुनते रहतेे थे। उस वक़्त वे इसे माँ के द्वारा दी गई गाली या गुस्से में कहे गये शब्दों के रूप में ही जानते थे। इसके पीछे छुपी मंशा से उनका बचपन अनभिज्ञ रहा। थोड़ा बड़ा हो जाने. थोड़ी अक्ल और समझदारी आ जाने पर उन्होंने इस बात पर गौर किया। तब उन्हें अपने ज़िन्दा होने पर दुःख हुआ पर मरने का रास्ता ज्ञात नहीं होने के कारण वे सब ज़िन्दा रहने के लिए विवश थे।

माँ की इन बद.दुआओं को झेलते सुनतेे वे पल गये और बड़े भी हो गये। बिना किसी तरह से मृत्यु आने या श्राप के भय से।

उस वक़्त मैं किशोरावस्था से जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहा था। मुझे आश्चर्य होता एक माँ अपनी औलाद के बारे में इस तरह कैसे सोच सकती हैं, अपनी कोख से पैदा की संतान के बारे में इतने कटुवचन कैसे बोल सकती हैं. मेरे लिए सदैव कौतुक का विषय रहा।

मैं अकसर सोचता, ऐसी क्यों हैं. वह माँ हैं या माँ के रूप में अन्य कोई मुझे इस ष्कौन का उत्तर नहीं मिलता। मैं लगातार अपनी समझ को खंखालता रहता और अपने साथए उनके बच्चे को बड़ा होते देख अपनी नासमझी से जूझता रहा।
 
                    ( दो )

उनके पिता बहुत मेहनती थे। वे अपने सामथ्र्य से ज़्यादा काम करते। इसीलिए सब पूरा हो जाता। बच्चे कभी भूखे नहीं रहे। तन पर ठीक.ठाक कपड़े रहते पर पहले बड़े के लिए आते। वह जब बड़े को छोटे होने लगते तो उससे छोटे को मिल जाते। बड़ा और बड़ा हो जाता। छोटा पहले जितने बड़े के बराबर बड़ा और बाकी सब अपने से बड़े के बराबर बड़े। बड़े के जन्म से पहले टेरिलीन और टेरीकाॅट बाज़ार में आ चुका था। यह अल्प पारदर्शीए हल्का और बरसों.बरस देह से चिपके रहने वाला होता। यह सूती और मक्खनडग के कपड़ों से सस्ता और टिकाऊ होता था। जिस हाफ़़ पेन्ट और बुशर्ट को बड़े ने पहना होताए वही सबसे छोटे के पास ज्यों का त्यों पहुँच जाता और उसकी देह पर फिट बैठता। बस! मशीन की उधड़ी हुई सिलाई हाथ से लगी सुई.धागे की तुरपन में बदल जाती। जो उन्हें नहीं भी जानताए वह उनकी ड्रेस से अंदाजा लगा लेता। इस तरह बड़े भाई के पेन्ट.कमीज़़ के नाम से सभी छोटों को अपने बड़े होने का एहसास और अपने घर का ठीक.ठीक पता याद होने लगा था कि वे कलह के घर में रहते हैं।

                    ( तीन )

हर दिन बढ़ती उम्र के साथ उनका डर और व्यग्रता बढ़ती जाती। उनके भय से उपजा एक सवाल मुझे भी कचोटतआ  उनकी माँ अन्य दूसरे बच्चों की माँ की तरह क्यों नहीं हैं, उनके पिता भी अन्य बच्चों के पिता की तरह नहीं हैं, पर इस क्यों का जव़़ाब. उनके घर से जुड़े घरों के आसपास तो क्या उस घर में भी नहीं था।

उनके पिता कोयला खदान में अस्थाई पद पर काम करते थे। वे बेहद परिश्रमी थे। लुहारी का काम करते थे। वे खदान से छुटने के बाद रात दस बजे तक एक और कारखाने में काम पर जाया करते। अच्छी.ख़ासी आमदानी हो जाती थी। पर रात होते ही शराब के नशे में डूब जाते। उस वक़्त उन्हें अच्छे.बुरे का होश नहीं रहता। वह अपने पराये का बोध खो बैठते। जैसे.जैसे रात गहरातीए बोतलें खाली होती जाती। नशा ऊपर चढ़ता। वे नीचे गिरते जाते। नीचे से ऊपर उठने के लिए वे गंदी.गंदी गालियों का सहारा लेते। पत्नी से लड़ते.झगड़ते। उसके मायके वाले को कोसते। अपमानित करते यह  उनका नित्य क्रम था।

उनकी माँ भी कम नहीं थीं। ईंट का जव़ाब पत्थर से देती। उसके पास हर बात का तोड़ होता। चुप रहना उसने सीखा नहीं। सह लेना उसकी प्रवृत्ति  में नहीं था। ऐसे में जब गाली पर गाली चढ़ती. वह घर कलह से भर उठता। बच्चे कोनों में कथड़ी ओढ़े दुबके पड़े रहते। वे आपस में लड़ते रहते। यद्यपि उनके पास लड़ने का कोई ठोस कारण नहीं होता फिर भी वे बुरी तरह लड़ते। पड़ोस में रहते हुए उनके जीवन में ऐसी कोई रात नहीं आई जो शान्ति से कट गई हो। वे अपनी संतानों के जन्म पर भी लड़े और अपने पिता की मृत्यु पर भी।

                      ( चार )

बोझिल दिन और कष्टप्रद रातों के बाद भी बच्चे मन लगाकर पढ़ाई करतेे। पढ़ने.लिखने की सुविधा जो नगर में मुफ़्त उपलब्ध थीए उन सभी को मिली। बस! लड़कियों को नौवी.दसवी के बाद पहले आये रिश्तें में  निपटा दिया गया। नौ में चार बेटियाँ थीं। चारों सुन्दर और सुशील। बहुत छोटी उम्र से ही वे घर के कामकाज में निपुण हो चुकी थी। बेटों की तरह उन्हें भी अपनी माँ सेए माँ की तरह प्यार नहीं मिला। हमेशा दुत्कारी जाती रही। घर पर सदैव बोझ समझी गई। उन्होंने कम और नासमझ उम्र में विवाह के बंधन में बांधें जाने पर ना.नुकूर नहीं किया। न किसी तरह से आपत्ति उठाई। वह तो जैसे पहले से तैयार बैठी थी कोई  आये और उन्हें कलह के घर से मुक्त कराकर ले जाये। मैंने देखा वहाँ से जब जो गया उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया। अपनी मुक्ति का गीत गाया।

 बेटे भी बेटियों की शादी होते तक जवान और सावधान हो चुके थे। वे सब घरेलू आतंक से मुक्ति पाने की जुगत में रहते। उनका पूरा बचपन और जवानी डर डरकर ही गई। डरए कलह से उपजा था और इसे सींचने का काम घरवाले भली.भांति किया करते थे। उनमें कट़ुता का कारण किसी को ज्ञात नहीं था। सब कयास लगाते। मैं नासमझ से समझदार समझी जाने वाली उम्र तक पहुँच चुका था। और दूसरों की तरह अंदाजा लगाता रह जाताण्ण्ण् पड़ोसी क्यों असन्तुष्ट रहते हैं घ् पड़ोसन क्यों आक्रमक हो उठतीघ् और इतनी कलह के बाव़जूद वे एक ही छत के नीचे क्यों रहते हैंघ् बड़ी से बड़ी पारिवारिक कलह का अन्त कुछ ही दिनों में हो जाता हैं। उनके घर यह कैसी कलह है कि समाप्त होने का नाम नहीं लेती बल्कि हर अन्त एक नये विवाद को जन्म देता क्यों यह न समझ पाना भी मेरे मानसिक तनाव का बढ़ा देता था।

उनके पड़ोस में आने से मेरा जीवन दूभर हो गया था। रात होने पर मेरी बेचैनी बढ़ जाती। मैं कहीं दूर भाग जाना चाहता पर भाग नहीं पाता।

                 ( पाँच)

उस घर में कोई हँसता नहीं। कोई गुनगुनाता नहीं। कोई आता नहीं और उन्हें बुरा कहे बगैर जाता नहीं । वहाँ मुँह से गालियाँ निकलती और शोर का हथौड़ा सदैव घर की शान्ति को कूढ़ता रहता।
मैंने आस.पड़ोस में कुछ लोगों को कहते सुना था कि उस घर में पति को पत्नी से शिकायत है, वह उसे ढंग से समझ नहीं सकी। ठीक इसके विपरित कुछ पड़ोसनों का कहना था.  औरत का सबसे बड़ा क्लेष यह हैं कि उसका पति उसकी भावनाओं की कद्र ही नहीं करता! ठीक इसके विपरित बच्चों को डर के साथ शिकायत थी कि आखिर क्या सोचकर हमें पैदा किया होगा उन्होंने।

शिकायतए अफ़सोस और जिज्ञासा के साथ जैसे.तैसे वे सब बड़े हो गये। बड़े होने पर एक हीन भावना उनके अन्दर घर कर गई। वे आस.पड़ोस में मुँह उठाकर चल नहीं पाते घ् मुहल्ले वाले उन्हें संदिग्ध  नज़रों से देखते। वे सब अपने आपको श्रापित समझते। हालाँकि एक विचार सदैव उनके मन में अटक काश ! अन्य घरों की तरह उनका भी घर होता तो कितना अच्छा होता। एक अच्छे घर की चाह सदैव उनकी आँखों में देखी जा सकती थी। वे आपस में चुपके.चुपके बात किया करते क्या  मोहल्ले या आस.पड़ोस में ऐसा कोई समझदार नहीं जो उनके घरेलू विवाद को शान्त करा सकेघ् हालाँकि एक बार किसी ने कोशिश किया था लेकिन परिणाम उल्टा निकला। किसी एक को उचित और दूसरे को अनुचित ठहराकर वह स्वयं अनुचित होकर रह गया। मध्यस्था का परिणाम एक नई कलह की शुरूआत में बदलकर रह गया। इसके बाद मोहल्ले.पड़ोस में लोग उनसे बचकर रहने लगे। अपना ज्ञान सारे जमाने में बाँट आते पर उस घर में सलाह देने की जोखिम उठाने का साहस  नहीं करते। यद्यपि पिटती हुई पड़ोसन ने कई बार चाहा कोई अड़ोसी.पड़ोसी उसे बचा ले। उसके पति को समझाये। उसे अच्छे बुरे का बोध कराये पर किसी ने कान नहीं दिया । इसी तरह कभी उसके पति ने भी सोचा होगा कोई तो इस बेवकूफ़ औरत को समझाये.बुझाये। पत्नी धर्म क्या होता हैं, पति के मुँह लग.लगकर ऊँची आवाज़ में बात नहीं करना चाहिएए आदिए इत्यादि। पर कभी कोई पड़ोसन ने समझदारी नहीं दिखाई। वैसे भी अड़ोस.पड़ोस में उनकी किसी से बनती नहीं थीं। न पटने का कारण वह पति के सिर पर मंड़ती। वह पत्नी के सिर पर। दोनों में कोई नहीं झुकता तोे ना.मालूम सी वज़ह से वे बच्चों को कूढ़पीट कर शान्त हो जाते। उनके चित्त में ठंडक पड़ जाती। बच्चे देर तक कलपते रहते।

                      ( छः )

बच्चों को अपनी बढ़ती उम्र के साथ एहसास होने लगा थाण्ण्ण्वह जिस घर मेंए घरवालों के चाहे बिना पैदा हुए हैंए में रहने सेे जीवन नरक बन जायेगा। उस घर से कलह कभी जाने वाली नहीं। भले ही वे चले जाये। निकाल दिए जाये पर कलह का नला कोई नहीं उखाड़ सकता।
अन्ततरूबड़े होकर उन्हें आभास हो ही गया ण्ण्ण्उनके माता.पिता ने सदैव वस्तुओं से प्यार किया।  रिश्तों को ठुकराया। मैंने भी देखा  वे दो चार कथड़ी और एक बोरा भांड़े लेकर आये थे। धीरे.धीरे उनकी गृहस्थी भरी.पूरी हो गई। फिर भी वे सन्तुष्ट नहीं हुए। एक अज़ीब तरह की अधीरता उनके भीतर पलती थी। पतिए पत्नी सेए माँ बच्चों से बिना गाली दिए बात नहीं करती। घर में कोई किसी को पुकारता नहींए चिल्लाता था इधर आ बे! और इस आ बेण्ण्ण् के साथए एक गंदी सी गाली जड़ देता।

अपने ढर्रे पर ज़िन्दगी जीते.जीते पड़ौसी एक दिन अस्थाई से स्थाई कामगार बन गये। कोयला खदान में अन्य स्थाई कामगारों की तरह उन्हें भी फटे तक तनख़्वाह और अन्य सुविधायें मिलने लगी। बढ़ी हुई तनख़्वाह के साथए उनके सुख का आकार भी बढा। उनके घर में वह सब हो गया जो एक सुखी और सम्पन्न घर में होना चाहिए। बढ़े हुए सुखों के साथ कलह की तोंद भी बाहर निकली। शोर का हथौड़ा वजनी  हुआ। पति अधिक निर्मम और पत्नी अधिक आक्रमक हुई। सुविधा और साधन बढ़ने के बाद स्वभाव बदल जाना जैसी बात उनके साथ नहीं घटी। वे जैसे थेए वैसे ही रहेए अशान्त और कलहप्रिय।  बेटियों की शादी के बाद तो उस औरत का व्यवहार और अधिक उग्र हो गया। उसके अन्दर भरी हिंसा बाहर नहीं आ पाती थी। भला.बुरा बोलने के लिए बेटियाँ नहीं रही। बेटे अक्सर अपना समय बाहर ही गुज़ारने लगे थे। अब वह अपनी सुबह पास पड़ोस की महिलाओं को कोसने से करती। अधिक उग्र हो जाने पर  गाली.गलौच भी करती। शाम होते.होते तक दो.तीन लड़के उसके हाथ से ठुक.पिट जाते। पिट पिटाकर बड़े होते लड़कों ने एक चालाकी सीख ली थी। जैसे ही पिटाई की शुरूआत में पहला हाथ पड़ताए वे चीखते हुएए हाथ छुटाकरए भाग खड़े होते। उनके पीछेए उनकी माँ के गुस्से में जहर बुझे शब्द तीर की तरह पीछा करते  हरामी की औलाद! आज तेरी हट्टी पसली एक करके रहूँगी।श् पिटाई के डर से घबराया हुआ लड़का बहुत देर तक घर नहीं लौटता। वह गुस्से में जलभुंज उठती। बददुआयें देती। गुस्सा जब हद पार कर जाता तो उनकी ठठरी तक बांध देती। उसकी घिनौनी और कर्कश आवाज़ जितनी दूरए जितने कानों तक जाती वे सब सिहर उठते।

                    (सात )

रिंकू सबसे छोटे से बड़ा और बाकी बड़े से छोटा था। वह न तो बड़ा था और न बिल्कुल छोटा। बड़े के हिस्से का घरेलू कामए बड़े के सामने न दिखने पर उसके हिस्से आ जाते थे। टिंकूए रिंकू से छोटा होने के कारण वैसे भी काम से बच जाता था। वह ही अकसर आटा चक्की जाता। घर आँगन लीपने के लिए बाज़ार चौैक से अलसुबह गोबर उठा लाता। उसे वहाँ कभी कभार चवन्नी.अठन्नी मिल जाया करती पर सदैव नहीं। सोमवार को ही। अन्य किसी दिन तो कभी नहीं। रविवार बाज़ार भरता था। बाज़ार में आसपास के चालीस गाँव के आदिवासी आते। वे सेठ साहूकारों को वनोपज सौंपए बदले में नून.तेल ले जाते। चार.बीजी के वज़न जितना नमक शोषण का युग था। सेठ उन्हें मुसकरा कर देखते। मुसकुराहट में भोलाभाला चेहरा झांसे में आ जाता। वे नमक के मोल ठगे जाते। उनके द्वारा लाई चार बीजी सस्ते दामों में खरीदते और ऊँची कीमत में नूनू तेल पकड़ा देते। ठगने और ठगाने के खेल में रूठी हुई चिल्लर या तो फटी हुई जे़ब से बाहर कूद जाती या भरी हुई जे़ब में अपनी सही जगह न बना पाने की विफलता में फिसल जाती। यही वही चवन्नी.अठन्नी होती जो रिंकू को गोबर उठाने के दौरान मिल जाया करती। वह उसकी पीपरमेन्ट ख़रीद कर अपने भाईयों में बांट दिया करता। उनके माता.पिता ने उन्हें कभी लाड़.दुलार नहीं किया इसीलिए पीपरमेन्ट ख़रीदकर देने का प्रश्न ही नहीं उठा। एक बार किसी दोस्त की बर्थ डे पार्टी में टिंकू को दो चाकलेट मिली। वह बहुत ख़ुश हुआ। चाकलेट पीपरमेन्ट से ज़्यादा मंहगी होती थी। स्वाद में भी अधिक लज़ीज। उसे सम्पन्न घरों में ही लाया और खाया जाता था। उसने पहली बार चाकलेट खाया। चाकलेट के स्वाद में बौराया उसने बड़े प्यार से माँ से पूछा था श्ण्ण्ण्अम्मा! मैं कब पैदा हुआ था। मेरा बर्थ डे कब आयेगाघ्श् उसकी माँ कुछ काम कर रही थी और थोड़ी देर पहले ही पति से  अच्छी.ख़ासी झड़प हुई थीं। उसने पूरा गुस्सा टिंकू पर उतारते हुए कहा श्ण्ण्ण्जब सारी दुनियाँ हगती थीए तब तुम पैदा होते थे। निकल यहाँ सेण्ण्ण्श् कहते हुए उसने एक जोरदार मुक्का उसकी पीठ पर धर दिया। वह किलबिलाता हुआ भागा। उसके पीछेए बाकी सब भी डर कर भाग गये। उन्हें ज्ञात थाए जब माँ को गुस्सा आता हैंए वह छोटा.बड़ा नहीं देखती। बस! कूढ़ देती हैं। जिसने गुस्सा दिलायाए यदि वह न मिला तो दूसरे को कूढ़ देती। इसीलिए एक के कुढ़ने के साथ ही सब एक साथ भाग खड़े होते ।
वह ब्रह्ममुहर्त रहा होगा। पड़ोसन ने आक्रोष में उसे हगने का समय बता दिया। हालांकि टिंकू को पड़ी मार के बाद किसी भी भाई.वहन को ज़िन्दगी.भर बर्थडे मनाने का ख़्याल नहीं आया होगा ।

मैं बड़ी उम्र में भी समझदार नहीं हो सका। मेरी जानकारी अपूर्ण और अपुष्ट थी। वह ऐसी क्यूँ हैं, जैसे सवाल लगातार मुझे सालते रहते। अपनी संतान को हरामी कहने का मतलब अपनी कोख को गाली देने जैसा हैंए फिर भी वह बात.बात में इस शब्द कोे दुहराना नहीं भूलती।  उनके पिता भी दो कदम आगे थे। जब गुस्सा होते अपने ही बेटे के पीछवाड़े भरपूर ताकत से लात मारते हुए कहते निकल  भौसड़ी के मेरे घर से।ष्ष् जबकि वे जानते थेण्ण्ण् उन्हें बेदखल कर देने से आकाश के सिवाय और कोई छत उनके लिए हो ही नहीं सकती।

                    ( आठ )

मैं बारहवी कक्षा में आ चुका था। मुझे आज भी स्मरण हैं उन  दिनों हमारे गाँव के घरों में पैखाने नहीं हुआ करते थे। सारे लोग सूरज के गुडमार्निंग करने के पहले हीए गाँव के आख़िरी सिरे पे बिछी रेलवे लाईन के नज़दीक बैठकर फ़ारिग होते थे। महिलायें और बच्चे गाँव के बीचों.बीच गुज़रने वाले नाले के आसपास निपट लेते थे। इस निपटन के दौरान आसपास के मोहल्ले की औरतों में गहरी दोस्ती हो जाती। घर.आँगन की बात साझा करने का यह बेहद गोपनीय स्थल और समय होता। हमारे गाँव के सारे राज इसी नाले के किनारे और आसपास गढ़े हैंण्ण्ण्ऐसा पड़ोस के पड़ोस की बूढ़ी अम्मा को कहते सुना था।

मेरी पड़ोसन नाले के किनारे बैठने वाले किसी भी समूह में अपनी जगह नहीं बना पाई थीं। यही कारण था कि उनके घर आई सम्पन्नता में पूरे गाँव में सबसे पहले उन्हीं के घर पैखाना बनाए जिसे वे टट्टी कहते थे।

उनका बड़ा बेटा जैसे ही मैट्रिक पास हुआए घर से निकलने की जुगत भिड़ाने लगा। स्नातक होते.होतेए उसे नज़दीक गाँव के स्कूल में मास्टरी मिल गई। वह मुक़्त हो गया। मुक़्त होने का यह मार्ग अन्य भाईयों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बना। वे सब जी जान से पढ़ाई करते और जब जैसा मौका मिलता निकलने की फ़िराक में रहते। उनके इन्हीं प्रयासों और बात.बात में दी गई उलाहना कि कल  भौसड़ी के मेरे घर से बेहद प्रेरणादायी रही। वे सब भी स्नातक होते.होते बाबूगिरी और मास्टरी में लग गये। उनकी मुक्ति जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। जीतण्ण्ण्कलह से शांति के मार्ग पर चले जाने कीए अश्लीलता से श्लीलता के वातावरण में पहुँच जाने की और मोहल्ले.पड़ौस की चुभती नज़रों से बचकर निकल जाने की। इस जीत में उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति और सुबह चार बजे से उठकर पढ़ाई करना  काम आया। यही वह समय होता ए जब घर में तनिक शान्ति होती थी।

                  ( नौ )

मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और एक अच्छी.खासी नौकरी पर लग गया था। घर वालों ने नौकरी लगते ही मेरी शादी कर दी। मुझे परेशान देखए पत्नी अकसर समझाईश देती  ष्ष्आप पड़ोस में कान क्यों देते हैं। अपना ध्यान पढ़ाई.लिखाई में लगाइये न।ष्ष् सलाह ठीक थी पर मन  चंचल। मैं ध्यान में कभी एकाकर नहीं हो सका। इस तरह के विवाद में मन और अधिक विकेन्द्रीत हो उठता। सबसे पहले मेरा ध्यान पड़ोस से आती गालियों पर ही जाता। आख़िर वे ऐसे क्यों हैंण्ण्ण् मैं तरह.तरह से कयास लगाता। हो सकता  उन्हें हाड़तोड़ मेहनत वाली अस्थाई नौकरी का तनाव घेरे रहता होगा। ऐसा एक बार उनके घर आयेए उन्हीं के दरूये दोस्तों में चल रही बातों से ज्ञात हुआ था। यदि कारणए मात्र इतना हैं तो इसके लिए पत्नी कहाँ ज़िम्मेदार हैंण्ण्ण् मेरी समझ से परे था। हालाँकि अब तक मैं इतना जान चुका था कि बोतल कलह पसंद आदमी को पीने लगी हैं। अन्दर.बाहर सदैव निडरता की खोल में छुपे मैंने उसे कभी आंख उठाकर चलते नहीं देखा। वह नीचे मुंड़ी करके ड्यूटी जाता। नीचे मुंड़ी करके ही घर लौटता। उसकी मुंड़ी घर की चौैखट पर आकर ही उठती। उसे देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि वह विवादित पड़ौसी  होगा।

                 ( दस )

वर्षों वह मेरे पड़ोस में रहे। पहले किराये से और बाद में मकान खाली नहीं किया या मकान मालिक ही मकान खाली नहीं करवा पाया तो उन्हें ही सस्ते दामों में बेच दिया हो जैसे कारणों से। मैं और मेरे परिवार ने कभी उनके घरेलू मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। कभी उपत कर उनसे बात करने का प्रयत्न नहीं किया। पड़ोसी से दुआ.सलाम करना जैसे संस्कार उनके पास नहीं थे। कुपात्रों से मित्रता रखनीए जैसा स्वभाव हमारे परिवार में किसी का नहीं था। हमने पड़ोसी धर्म का पालन किया। वह जैसे रहेए रहने दिया। उनके रहने और प्रवृति पर कभी कोई आपत्ति नहीं रही। बावजूद इसके हमारी विवशताए सज्जनता की फटी हुई चादर में बिलखती रही पर हमने विरोध नहीं किया। अन्य कोई ठिकाना न होने के कारण हम और वे वहीं बने रहेण्ण्ण् अड़ोस.पड़ौस में। हम अपनी विवशता के साथ और वे कलह के साथ।

हमारे पड़ोसी बने उन्हें तीन दशक से ज्यादा हो गये । उनके सारे बच्चों का जन्म हमारे पड़ोस में हुआ। बेटियाँ पैदा होकर पराई हो गई। बेटे जवान होकरए नौकरी परए चार हाथ हुए बगैर घर से निकल पड़े। सब मेरे सामने घटा। मैं पिछले तीन साल अन्यत्र ट्रान्सफ़़र पर बाहर गांव रहा। जोड़.तोड़ कर पुनः अपने गाँव जो नगर बन चुका था लौटा तो पाया कि वह घर बस चार दीवारियों का मकान बनकर रह गया। डरए डरकरए डरे हुए से रहने वाले  लड़के अवसर पाते ही कलह के घर से आज़ाद हो गये।

                  ( ग्यारह )

उस घर में  वे दो ही रहे। दोनों बूढ़े और लाचार। अब भी अपने कलहप्रिय व्यवहार और अंहकार से लबालब भरे । आदमी अपने लंगढ़े गुस्से की बैशाखी पर घसीटता रहता और औरत अपनी झुकी हुई कमर के साथ न जाने क्या बडबड़ाती रहती हैं। उस घर में कोई नहीं आता। सामने से निकलता तो मुँह फेर लेता। वैसे तो ढेरों जान.पहचान वाले उस घर के सामने से गुज़रते पर रूकता कोई नहीं। वे सब को देखतेए कोई उनकी तरफ़ देखता तक नहीं। उनके बच्चे संत.त्योहार में भूले भटके या लोकलाज की परवाह कर आ जाते तो उलटे पाँव लौट भी जाते।   मैं रिटायरमेन्ट के करीब था। वे सालों पहले रिटायर्ड हो चुके थे। उन्होंने कभी मेरे परिवार को अपना नहीं समझा। हमनेे कभी उन्हें अपना दुश्मन नहीं माना।  आॅफ़िस जाने और लौटने के दौरान जब कभी वे मेरे सामने पड़ जातेए मैं उनसे नमस्ते  कर लेता। दरअसल मेरा यह अभिवादन उनके घर डर और कलह के बूढ़े होने पर आई शान्ति के लिए होताए जिसके बिना मैं पिछले कई वर्षों ढंग से जी नहीं पाया था। उन्हें नमस्ते कर मुझे एक आत्मिक शान्ति मिलती और उन्हें एक अनजान सी आवाज़ भर। इसके बावजूद मैं अब तक कलह और डर के घर के रहस्य को समझ नहीं पाया था .



सम्पर्कःनई पहाड़े काॅलोनी,जवाहर वार्ड, गुलाबरा, पो. जिला. छिन्दवाड़ा ;म.प्र. 480001 मोबाइल 9425837377

                 








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