पतहर

पतहर

पतहर पत्रिका का जन्मशती-स्मरण अंक संग्रहणीय


                   
           डाॅ डी एम मिश्र     
 लघु पत्रिकाएँ जिस धमक और जज्बे के साथ सुधी पाठकों के सामने आती हैं वह  बड़ी पत्र -पत्रिकाओं के वश की बात  नहीं। ये लघु प़ि़त्रकाएँ मासिक हों अथवा त्रैमासिक व  षटमासिक , पाठक बड़ी बेसब्री से इनका इंतजार करते हैं । देवरिया उ0 प्र0 जिले के एक गाँव बहादुरपुर पोस्ट बड़हरा से विभूति नारायण ओझा के सम्पादन मंें छप रही पत्रिका पतहर का वर्ष 2 अंक 2-3 प्राप्त हुआ है ।यह अंक - स्मरण - अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है । मुक्तिबोध और त्रिलोचन के शताब्दी वर्ष पर  केन्द्रित  यह अंक अत्यन्त पठनीय और नये कलेवर संे सुसज्जित है ।
   पत्रिका के आवरण पर ही  मुक्तिबोध के हाथ की लिखी कविता ‘‘ ़द्युति की कली ‘‘  विरासत के रूप में बडें आकर्षक ढंग से प्रस्तुत की गयी है । ‘‘ अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे और तोड़ने ही होंगे गढ़ और मठ सब ‘‘ अत्यन्त सारगर्भित सम्पादकीय के पश्चात , डाॅ महेन्द्र नाथ पाण्डेय का लेख - मुझे भ्रम होता है कि हर चमकता हुआ पत्थर हीरा होता है ,प्रो0 अनिल राय का लेख ’- साहित्य में विचार धारा का प्रश्न  और  प्रो 0 चतुरानन ओझा का लेख -मुक्तिबोध के साहित्य में यथार्थ चेतना । ये तीनों लेख  इस तथ्य की विवेचना  करते  हैं कि मुक्तिबोध का सामाजिक यथार्थ द्वन्द्वात्मक  है लेकिन वह काल्पनिक आदर्शों से प्रेरित यथार्थ नहीं है। पत्रिका के इस अंक का एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख कौशल किशोर का है - यथार्थ का अंधेरा और अंधेरे का यथार्थ । इस लेख में बड़ी जिम्मेदारी के साथ लेखक ने मुक्तिबोध जैसे सर्जक की आत्मा की गहराई में झांकने का यत्न करते हुए लिखा है कि मुक्तिबोध की कविता जिस अंधेरे से रू ब रू है ,वह आजादी के बाद लगातार सच्चाई बनकर उभरा हैं । उसका विस्तार ही नहीं हुआ ,वह सघन भी हुआ है । कुमार विश्वबंधु,शिवकुमार यादव,डाॅ प्रेमव्र्रत तिवारी ,डाॅ नरेन्द्रनाथ सिंह , विजय शिदें , डाॅ शकुन्तला दीक्षित ,डाॅ अंगद कुमार सिेह और अमित कुमार सिेह  के लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण और संग्रहणीय हैं जो मुक्तिबोध की रचनाधर्मिता के विभिन्न आयामो पर प्रकाश डालते हैं। ज्यादातर सामग्रियाँ मुक्तिबोध पर  केन्द्रित है । त्रिलोचन पर डाॅ डी0 एम0 मिश्र का संस्मरणात्मक  लेख है - अपने दोष पहचानने वाला कवि सबसे बडा होता है  और एक कविता भी - धरती का हरसिंगार -त्रिलोचन । इसके अतिरिक्त सामान्य अंक की तरह कहानियाँ , गीत , कविताएँ , गजलें , यात्रा -सेस्मरण , पुस्तक - चर्चा आदि भी हैं इस  अंक में  । 
    पत्रकारिता पर सुभाष राय का एक बड़ा बेबाक मगर रोचक लेख  है -पत्रकार सिपाही हो , उसे सेाचना नही । बिल्कुल ठीक वैसे जैसे एक सिपाही केा बन्दूक थमा दिया जाता है और वह अपने कमान्डर  के आदेश तक उसकी सीमा होती है।स्वप्निल श्रीवास्तव का  लेख - सर्वेश्वर का कविता संसार भी इस अंक को महत्वपूर्ण बनाता है । चंद्रकांत देवताले पर जाहिद खान और बादशाह हुसैन रिजवी पर भी स्वदेश कुमार सिन्हा 
का संस्मरणात्मक लेख श्रद्धांजलि के रूप में दिया गया हैं । 
लेखक सम्पर्क-08318750020,संपादक सम्पर्क-09450740268












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