लेखक - वीरेंद्र बहादुर सिंह
उनके पिताजी डाक्टर द्वारा लिखी गई दवा लेने गए थे, इसलिए इस समय दादी का बिस्तर बिलकुल खाली था। हालचाल पूछने आए लोग उठकर जा चुके थे और उनकी मां रसोई में चली गई थीं। जैसे ही तीनों भाई-बहनों को अकेलापन मिला, वे आपस में धीमी आवाज़ में बातें करने लगे।
“डैडी ने सचमुच हमें बुलाने की बहुत जल्दी कर दी,” स्नेहा फुसफुसाते हुए बोली।
“मुझे तो यही कहा गया था कि दादी बस एक-दो घंटे की मेहमान हैं। जो भी गाड़ी मिले, उसमें बैठकर तुरंत आ जाओ,” अजय ने बिना आवाज दबाए कहा। उसे किसी के सुन लेने का डर नहीं था।
“तू तो बेटा है, तुझे आना ही पड़ता। लेकिन हमें इतनी हड़बड़ी में बुलाने की क्या जरूरत थी?” दीवा ने भी उसी बेपरवाही से कहा।
“मैं तो अपने बच्चों को पड़ोसियों के भरोसे छोड़कर आई हूं।”
“और मेरे जीजाजी को तो एक वक्त का भी बाहर का खाना पसंद नहीं है। आज चौथा दिन हो गया।”
“तो मैं भी अपना शोरूम इतने दिन बंद रखकर कैसे बैठ सकती हूं? आजकल के इस प्रतिस्पर्धा वाले व्यापार में?”
कुछ देर तक तीनों चुप रहे।
फिर स्नेहा बोली, “इतने दिन तो किसी तरह निकल गए, लेकिन पता नहीं अभी और कितने दिन लगेंगे?”
“कम से कम एक हफ्ता तो पक्का,” अजय ने कहा।
दीवा बोली, “मुझे तो उससे भी ज्यादा समय लगेगा ऐसा लगता है। देखो न, आज दादी ने कितना सारा पपीता खाया है।”
“तो फिर हम क्या करेंगे?”
“मैं तो कल ही लौटने का सोच रही हूं।”
“डैडी को अच्छा लगेगा?”
“क्या वह मेरे घर की परेशानियों का भी नहीं सोचेंगे?”
“तो फिर मैं भी क्यों रुकूं?”
“मैं भी अब नहीं रुकने वाली।”
दोनों बहनों ने अपना फैसला सुना दिया तो अजय बोला, “मैंने तो सुबह ही डैडी से कह दिया था कि आप लोग हैं, फिर मेरी यहां क्या जरूरत है?”
फिर कुछ देर सन्नाटा छा गया।
स्नेहा बोली, “मैं तो जाते समय डैडी से साफ कह दूंगी कि बाद में खबर कर देना।”
“वैसे भी बेटियों का यहां क्या काम होता है?” दीवा ने कहा।
अजय बोला, “मैं भी यही कहूंगा कि डाक्टर की रिपोर्ट आने के बाद ही मुझे फोन करना। बेकार की जल्दी मत करना।”
रात को तीनों भाई-बहनों ने डैडी से वापस जाने की बात की। दोनों बेटियों को तो वह कुछ न कह सके, लेकिन बेटे से बोले, “तुझे तो रुकना पड़ेगा।”
“जब आप और मम्मी हैं, तो मेरी यहां क्या जरूरत है?”
“अगर अचानक कुछ हो गया तो?”
“अगर अभी समय लगेगा तो मैं एक चक्कर लगाकर वापस आ जाऊंगा।”
“लोग क्या कहेंगे, अगर तुझे जाते हुए देखेंगे?”
“क्यों कहेंगे? अगर मेरी मां बिस्तर पर होतीं तो मुझे रुकना पड़ता। लेकिन यहां तो आप लोग हैं।”
डैडी आगे कुछ न कह सके।
अजय ने फिर कहा, “और सुनिए, डाक्टर त्रिपाठी मेरे दोस्त हैं। अगर कुछ भी हो जाए तो उन्हें तुरंत बुला लेना। उनकी रिपोर्ट आने के बाद ही मुझे खबर करना। मैंने उनसे बात कर ली है। आप कहेंगे तो वे तुरंत आ जाएंगे।”
अगली सुबह जो भी वाहन मिला, उसी से तीनों भाई-बहन अपने-अपने घर लौट गए। जाते-जाते भी अजय डाक्टर की रिपोर्ट की बात याद दिलाना नहीं भूला।
दोपहर में वह घर पहुंचा ही था कि डैडी का फोन आया।
“पहुंच गया?”
“हा, अभी नहाकर निकला हूं। कोई काम था?”
“और क्या, दादी नहीं रहीं।”
“क्या, ऐसा तो लग नहीं रहा था। डाक्टर को दिखाया?”
“नहीं।”
“मैंने आपसे क्या कहा था? पहले डाक्टर को बुलाइए, उनकी रिपोर्ट आने के बाद ही मुझे फोन कीजिए।”
“अच्छा।” इतना कहकर डैडी ने फोन रख दिया।
अजय ने लगभग आधा घंटा इंतजार किया। जब दोबारा फोन नहीं आया तो उसने खुद फोन मिलाया। घंटी बजती रही, लेकिन किसी ने नहीं उठाया।
कुछ देर बाद उसने फिर कोशिश की। इस बार उधर से रिसीवर उठा।
अजय गुस्से में बोला, “कौन?”
“मैं... डैडी।”
“कब से फोन कर रहा हूं, कोई उठाता क्यों नहीं?”
“तैयारियों से फुरसत मिले तब न। मैं अकेला हूं, सब कुछ कैसे संभालूं?”
“तो तैयारी शुरू हो गई?”
“और किसका इंतजार करूं?”
“डाक्टर को नहीं बुलाया?”
“अब उसमें डाक्टर को क्या बुलाना?”
“आप भी कमाल करते हैं!”
“तू कब निकल रहा है?”
“लेकिन आप...”
“क्या?”
“डाक्टर को क्यों नहीं दिखाया?”
“अब क्या फायदा? लोग भी आने लगे हैं।”
“मुझे लगता है कि आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं। आप चाहते हैं कि मैं वहां आ जाऊं, इसलिए...”
“क्या बकवास कर रहा है?”
“तो फिर डाक्टर को क्यों नहीं बुलाते? मैंने यहां से डाक्टर त्रिपाठी को दो बार फोन किया। वे कह रहे थे कि कोई बुलाने आएगा तभी मैं जाऊंगा। आपने उन्हें...”
“अब तो अर्थी बांधने की ही देर है।”
“लेकिन आपको डाक्टर बुलाने में परेशानी क्या है?”
“डाक्टर को बुलाऊं और अगर उन्होंने कहीं...”
“अरे, मैं अभी निकलता हूं...” अजय जल्दी से बोला।
लेकिन तब तक डैडी फोन रख चुके थे। अजय के वे शब्द रिसीवर से टकराकर उसी के पास लौट आए।
वीरेंद्र बहादुर सिंह
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